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संग्रह की कविताएं अत्यंत सहज, सरल और सीधे-सीधे पाठकों तक संप्रेषित होने वाली हैं । उनमें प्रायः एक अनगढ़पन भी है, लेकिन कवि अपने सामाजिक एवं मानवीय सरोकारों के प्रति अत्यंत गंभीर है । आज जबकि पूरी दुनिया समूची धरती को बचाने के लिए चिंतित है, डॉ.

इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है-दिल को दहला देने वाला। तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं। हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं। इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की अपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे देता है। तब गांधी से बड़ा गांधी लगता है वह-एण्क निपट मानव के रूप में। अपनी परदादी मां ‘पुतली मां’ पर भी सुमित्रा जी ने विस्तार से लिखकर ‘गांधी-परिवार’ की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है। संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी!

किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार नरेन्द्र कोहली का रचना-संसार बहुआयामी है। विभिन्न विधाओं में उन्होंने रेखांकित करने योग्य रचनाएं लिखी हैं। पौराणिक व जीवनीपरक उपन्यासों के क्षेत्र में तो उन्हें शीर्षस्थ लेखक स्वीकार किया जाता है।

अजितकुमार के लेखन में समता, असांप्रदायिकता, सौंदर्यवादिता और जनपक्षधरता मौलिक रूप से विद्यमान है। उनका इतिहास-बोध भारतीय उपमहाद्वीप को भौगोलिक और राजनीतिक परिसीमाओं से ज़्यादा उदार घोषित करता है। वे भारत की बहुलता के समर्थक हैं। उनकी रचनाएँ उनकी वैचारिक ऊष्मा की प्रतीक हैं। सृजन के सभी गुणधर्मों का स्पर्श करने वाला अजितकुमार का लेखन परंपरा और आधुनिकता व उत्तर-आधुनिकता के आदर्शों को संकेतित करते हुए सनातनता की अवधारणा को पुष्ट करता है।

‘सुन मुटियारे’ उपन्यास उस तरुणी (मुटियार) की कहानी है, जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में। पंजाब भी ‘बंटवारे’ से पहले का पंजाब-जब अनबँटी जमीन थी और अनबँटे ही दिल थे.

जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी get more info । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।

संघर्षरत 'सु-राज' के गांगि 'का हों, या अन्याय की आग में धधकता 'अंधेरा और' का परसिया या 'काँछा' उपन्यासिका का नायक सुदूर नेपाल का अनाथ श्रमिक शिशु काँछा, अपने अस्तित्व के लिए जूझते ये पात्र, मात्र पात्र ही नहीं, तिल-तिल मरकर कहीं अपने समय के 'काल-पात्र' भी हैं ।

एक प्राचीन गाथा कहती हूँ कि अत्रि ऋषि जब अग्निवेश को काया तंत्र क्य रहस्य बता रहे थे, तो उन्होंने कहा- 'कालगणना से चार युग कहे जाते हैं, वही चार युग इन्सान की काया में होते हैं... 

कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।

यह किताब प्रेम जनमेजय के संपादकीय विवेक का परिचय देती है। इसमें परसाई का महत्त्व है, मूल्यांकन है। उनके व्यक्तित्व पर आलेख हैं। इसमें शामिल मुख्य लेखक हैं—राजेन्द्र यादव, सूर्यबाला, नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी, विश्वनाथ त्रिपाठी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, नरेन्द्र कोहली, शिव शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, अतुल चतुर्वेदी आदि। पुस्तक इन खंडों में संयोजित है—संपादकीय, चिंतन, स्मृतियों में, परसाई से बातचीत। परसाई पर पहले भी अच्छी सामग्री प्रकाशित हो चुकी है। यह पुस्तक उसमें गुणात्मक वृद्धि है। शीर्षक ही बताता है कि प्रेम जनमेजय किसी भी रचनाकार को धार्मिक पुस्तक की तरह अनालोचनीय, अन्यतम, मानवेतर और आसमानी नहीं मानते। शीर्षक में गहरा व्यंग्य है। जिन लोगों ने परसाई को पठनीय के स्थान पर पूजनीय बना रखा है, यह वाक्य उन पर तंज करता है।

'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र यादव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिंहवाहिनी', 'मैं तुन्हें मार दूँगा', 'वहाँ तक पहुँचने की दौड़', 'रोशनी कहीं है?

आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या?

ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।

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