Everything about Chamatkari Totke - यह लिखकर जेब में रख ले किसी मंत्र की जरूरत नहीं "Vashikaran Without +91-9914666697




सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।

सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है !

बहुत बार तथाकथित किंवदंतियां या लोकवार्ता भी इतिहास बनती हैं । अत: पौराणिक आख्यान, स्थान विशेष के माहात्म्य, वीरगाथाओं तथा कथाओं को भी यर्थाचित स्थान देकर प्रस्तुत किया गया है ताकि आसानी शोधकर्ता कार्य कर सकें ।

आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था।

लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।

‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।

The Rising Years read more is really a novel that deals While using the life of a mom residing in the shadow of Loss of life and, also the distressing, exploratory decades of adolescent little ones.

यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है।

पुस्तक में वर्णित अनेक महापुरुषों के बारे में हम काफी जानते रहे हैं, पर उनकी चर्चा करते समय हमें कभी ध्यान नहीं रहता है कि वे विकलांग थे । पुस्तक में दिखाया गया है कि किस प्रकार इन विभूतियों ने अपने जीवन में तमाम बाधाओं का सामना किया तथा पीड़ाएँ सहीं और अंतत: इन पीड़ाओं को ही पूँजी बनाकर सफलता हासिल की । इनमें से अनेक को समाज से कुछ नहीं मिला, पर उन्होंने समाज को जो दिया, वह अमूल्य था ।

आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी

'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'

सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ, भाषाओं और देशों की सीमाओं को लाँघ लेखकों- पाठकों की विश्व बिरादरी का हिस्सा बन चुका है । गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो एक अद्वितीय कथाकार तो है ही, एक अजब और आजाद शख्सीयत भी है । फीनिक्स पक्षी की तरह वह उड़ानें भरता रहा, अपनी ही राख से पुनर्जीवित होता रहा, जिन्दगी और लेखन के मोर्चों पर जीता-मरता रहा और भारतीय उपमहाद्वीप की साइकी में उतर गया । जाहिर हैं, ऐसे लेखक को 'पाकिस्तानी' या 'हिंदुस्तानी' कठघरों में रखकर नहीं देखा जा सकता । मंटो जैसे कालजयी लेखक की जिन्दगी को 'मंटो जिन्दा है' में जीवंतता, गतिशीलता और संपूर्णता से पकडा गया है ।

क्यों ऐसा नहीं हुआ कि उदय प्रकाश की कविताओं में छिपे उनके कथाकार और उनकी कहानियों में छिपी कविता पर सतर्क पाठको का ध्यान जाता और मूल्यांकन की कोई और नई समावेशी पद्धति जन्म लेती ! जिस जादुई यथार्थवाद के लिए ….

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